Thursday, September 5, 2024

धर्म और विज्ञान की सोच की अवधारणा

 धार्मिक व्यक्ति के अनुसार पहले ज्ञान था अब हम ज्ञान को भूल चुके हैं और अज्ञानी हो गए


विज्ञान के अनुसार पहले हम कम जानते थे आज हम पहले से ज्यादा जानते हैं क्यों की विज्ञान मे हर चीज को खा कर, चख कर महसूस किया जाना की क्या चीज अच्छी है क्या चीज बुरी है जिसमे उनकी पीड़ियाँ निकल गयी हैँ तब जाकर वर्तमान पीढ़ी को उतना ज्ञान मिलता है जो काफी नहीं होता है 



भविष्य में हमें और भी बहुत कुछ जानना है क्यों कि ज्ञान धीरे धीरे बढ़ता है


धार्मिक व्यक्ति कहता है सत्य मेरे मजहब में है क्यों की सत्य सिर्फ मेरा ही मजहब है मेरे मजहब मे जो लिखा है वही सत्य है जो कुछ सत्य था वह मेरे मजहब की धार्मिक किताब में लिखा जा चुका है


मेरे मजहब की सारी बातें सच है


जबकि विज्ञान कहता है अभी तक के प्रयोगों और अनुभवों के अनुसार हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं


अभी हमें और सत्य जानना है


विज्ञान कोई दावा नहीं करता 


उसके पास कोई वाद नहीं है 


यहां आपकी पसंद-नापसंद का कोई मतलब नहीं है 


यह किसी को अपनी बात मानने के लिए दबाव नहीं डालता 


विज्ञान के पास घमंड नहीं है वह नम्र है 


विज्ञान अपना लाभ उसे भी देता है जो उस में यकीन नहीं करते


बुखार होने पर अल्लाह का नाम उसी को राहत देता है जो अल्लाह में यकीन करता है


इसी तरह बुखार होने पर राम का नाम उसी को शांति देता है जो राम में विश्वास करता है


लेकिन विज्ञान के द्वारा बनाई गयी बुखार की दबाई दोनों पर असर करेंगी चाहे उसमे उसकी आस्था हो या ना हो बो हर व्यक्ति पर एक समान असर करेगी 

 विज्ञान का बनाया हुआ पंखा सबको एक जैसी शीतलता देता है भले ही आप विज्ञान और पंखे में यकीन करते हैं या नहीं


मनुष्य आज जो जी रहा है वह वैज्ञानिक समझ के कारण जी पा रहा है 


घर बनाने का विज्ञान हो समाज और आपसी रिश्ते समझने का समाज विज्ञान या मनोविज्ञान हो पहिए की खोज से लगाकर चिकित्सा या अन्य जीवन का कोई भी क्षेत्र हो 


मनुष्य ने देखकर समझ कर खोज करके समझ को आगे बढ़ाया है


समाज का काम काज संविधान कानून समाज विज्ञान के आधार पर चलता है 


संविधान कहता है सबके मानव अधिकार एक समान है


लेकिन मजहब में डूबे हुए लोग एक दूसरे के मानव अधिकार कुचले जाने पर खुश होते हैं


धर्म की बुनियाद पर अलग-अलग समुदाय में बंटे हुए लोग खुद को दूसरों से अलग समझते हैं और दूसरे की तकलीफ पर या तो ध्यान नहीं देते या उन्हें तकलीफ में देखकर खुश होते हैं और तकलीफ देने वाली सरकार का समर्थन करते हैं


जबकि सच्चाई यह है हम सबके सुख दुख सांझे हैं धरती सांझी है समाज सांझा है एक समुदाय तकलीफ में रहेगा तो तकलीफ सबको होगी 


लेकिन अभी समझदारी पर आधारित समाज बनना बाकी है

Wednesday, September 4, 2024

बलात्कार की वजह और सोच -भाग 1

 बलात्कार एक दुर्दांत चिंता का विषय जितना बीते १०-1५ वर्षों में बन के उभरा हे उस से ज्यादा बड़ा शायद आतंकवाद का  भी मुद्दा नहीं होगा सोचने की बात हे की हमारे देश में जिस रफ्तार से रेप हो रहे हें उस रफ्तार से शायद ही किसी विकाशसील देश में व्यवस्था होगी जिसमे मीडिया और सरकार की जिमेदारी शून्य होगी 

जहाँ सरकार केंद्र के अनुसार हो वहां पर बलात्कार के विषय पर मौन होना और जहाँ सरकार विपरीत हों वहां पर न्याय की मांग के लिए खड़े होना  सरकार का महिलाओं के प्रति न्याय देना और महिलाओं की सरकार में हिस्सेदारी और महिला आयोग की इमानदारी पर भी सवाल खड़े करता हे 

बलात्कार एक घिनोना कृत्य हे फिर वह देश के किसी भी गली मोहल्ले और किसी भी सरकार के रहते हुआ हो बह एक अपराध हे और अपराधी में हिन्दू मुस्लिम देखना उस से भी बड़ा अपराध हे क्यों की उसकी आड़ में कहीं न कहीं उस अपराधी की दूसरी पहचान को बल देते हें 

बलात्कार किस की सोच हे ?

न तो ये पूर्ण पुरुषों की सोच हो सकती हे और नाही किसी लडकी या ओरत के कपड़ों की वजह से हो सकता हे 

न लडकी के पढने से रेप होता हे , नाही रेप लडकी के रात में बाहर निकलने से रेप होता हे , नाही लडकी के छोटे कपड़े पहन ने से रेप हो सकता हे 

RAPE



फिर सवाल भी तो यही हे की रेप होता क्यों हे? क्या राम राज्य में रेप नहीं हुए ? क्या द्वापुर में बलात्कार नहीं हुए ?

तो ये कहना भी गलत हे की बलात्कार सिर्फ आज के जमाने की सोच हे ये हमारे समाज उस वक़्त से हे जब से इंसान से स्वतंत्र रूप से सोचना प्रारम्भ किया हे और में शायद इस बात से भी तालुक रखूं की ये उस वक़्त भी रहा होगा जब लोग सोचना समझना प्रारम्भ क्र रहे थे उस समय भी था 

क्या राम राज्य में बलात्कार नहीं हुए ?

ये भी कहना गलत हे की राम राज्य में बलात्कार नहीं होते थे सब छोड़ो मेंने तो उसी रामायण जिसको बाल्मीकि जी ने लिखा हे उसी में पढ़ा हे की देवराज इंद्रा  ने केसे धोके से माता अहिल्या से सरीरिक सम्बन्ध बनाये थे 

"अहिल्या पतिव्रता देवी इंद्रेण वञ्चिता ।

विश्वामित्रेण शप्ता सा भवति शिला ।"

"इंद्रेण वञ्चिता देवी अहिल्या पतिव्रता ।

रामेण दर्शिता सा देवी पुनर्जीविता ।"

ये चोपाई में इस लिए भी लिख रहा हूँ ताकि किसी अंधे हिन्दू धर्म के धर्म रक्षक का धर्म खतरे में न आये और उसको पता रहे की बलात्कार हर युग में होते आये हें

क्द्वाया द्वापुर में  ओरतों को पर्याप्त सम्मान मिला था ? 

द्रोपदी की इज्जत को लेकर कई बार हमला किया गया था, लेकिन वह अपनी इज्जत और आत्मसम्मान को बचाने में सफल रही। यहाँ कुछ घटनाएं हैं जहां द्रोपदी की इज्जत को लूटने की कोशिश की गई:

1. चीर हरण: दुर्योधन और कर्ण ने द्रोपदी का सारी उतारने की कोशिश की, लेकिन भगवान कृष्ण की मदद से द्रोपदी की इज्जत बच गई।

2. द्यूत क्रीड़ा: युधिष्ठिर ने द्रोपदी को द्यूत क्रीड़ा में हार गया, जिसके कारण द्रोपदी को दासी बना दिया गया।

3. कीचक की बदतमीजी: कीचक ने द्रोपदी पर हमला किया और उसकी इज्जत को लूटने की कोशिश की, लेकिन भीम ने कीचक को मार डाला।

4. जटासुर का हमला: जटासुर ने द्रोपदी को अगवा करने की कोशिश की, लेकिन भीम ने उसे मार डाला।

5.  जयद्रथ का हमला: जयद्रथ ने द्रोपदी को अगवा करने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन ने उसे मार डाला।

इन सभी घटनाओं में द्रोपदी की इज्जत को लूटने की कोशिश की गई, लेकिन वह अपनी इज्जत और आत्मसम्मान को बचाने में सफल रही।

 क्या कलियुग और द्वापुर में ओरत के लिए कोई अलग सोच हे समाज में अगर हे तो क्या 

धर्म का राजा कहे जाने बाले युदिष्ठिर अपनी ओरत को एक वास्तु की तरह जुए में लगाने का सामन समझते हें और आज कल के पुरुष सिर्फ सुने रास्ते पर चलने बाला उपभोग का मोका , अंतर कहीं नहीं हे 

कहीं से कहीं तक रेप में जिसको मजा आता हे तो बो पुरुष ही होता हे खैर ये मेरा मान न हे जो अन्य के भिन्न भी हो सकता हे

इसको और समझने के लिए बीते कुछ सालों का विवरण देखते हें 

जिसको हम सवालों के नजरिये से देख कर हल करने की कोसिस कर रहे हें 

क्या रेप नशे की हालत में होते हे ?

जी नहीं नशे के हालत में ही अगर होते तो नसेल्ची को ये केसे याद होता हे की ये मेरी बेटी हे ये किसी और की या ये केसे पता होता हे की इसमें मुझे आनंद मिलेगा ?

क्या रेप सिर्फ लडकियों से होता हे ?

जी नहीं रेप लडकों से भी होता हे , घर के अंदर बेठी उन ओरतो से भी होता हे जो घर के बाहर नहीं निकलती हे , और उन ६० साल की ओरतों से भी होता हे जो मरघट का रास्ता देख रही होती हें , और उन जानवरों से भ हो ता हे जिन पर एक आदमी अपना बल प्रयोग क्र सकता हे 

जब रेप करने के बाद पुरुष को सनतुस्टी मिल चुकी होती हे तो फिर मारता क्यों हे ?

एसा नहीं हे की सिर्फ सम्भोग मात्र करना था असल में एक बात सोचो अगर सिर्फ रेप करना होता तो रेप इतने घिनोने और नीच तरीके के रेप कौन करता हे , शायद जानवर भी इस तरीके से किसी जानवर की लाश को नहीं फाड़ते होंगे या खाते होंगे जिस तरीके से कथाकथित सभ्य कहे  जाने बाले लोग अपनी ठरक मिटाने के लिए करते हें पहले रेप ,फिर उसको जिन्दा जलाना , या पहले सामूहिक रेप फिर योनी में बोतल , सरिया , डंडा का इस्तमाल करना क्या ये करने से संतुस्ती मिलती होती तो यही काम इन्होने अपने घर पर कितनी बार किया होगा , मगर अवशोष घर पर नहीं किया होगा कभी 

असल में इंसान अंदर से जितना क्रूर होता हे बो बेसा  ही रहता हे ,उसको सुकून मिलता हे उस को दर्द में देख कर  तडपता हुआ देख के रेप का अंतिम उदेश शायद यह नही हो लेकिन रेप के बाद का अंतिम उदेश यही होता हे शत प्रतिशत में कह सकता हूँ 


क्या लडकियों के छोटे कपड़े पहन ने की वजह से रेप होता हे ?

अगर एसा हे तो ६० साल की किसी ओरत का रेप क्यों होता हे और किसी साडी पहन ने बाली ओरत का रेप क्यों होता हे भारत में  जबकि असल मायनों में भारत रेप के मामले में ओरतों की सेफ्टी को लेके दुनिए कंगाल देशों से भी पीछे पहुच गया हे शायद 1 साल की लड़की को केसे साडी पहना सकते हो जिसको ये नहीं पता की कौन उसका क्या हे इस उम्र की अबोध बालिकाओं के साथ भी रेप हुआ हे उस पर क्या लोजिक दोगे क्यों हुआ हे एसा 

एक साल की लडकी को देख के किस के हार्मोश तेज होने लगे और अगर इसे एजुकेशन और ईएसआई सोच के लोग अगर हमारे समाज में हमारे आस पास हें तो यकीं मानो आज किसी और की बाजी हे तो कल आपका दरबाजा दरबाजा होगा 

ये कहना बंध कीजिये की लडकि बचाओ लड़की पढाओ असल में आज के युग में और जब से रेप और उंच नीच की राजनीति और पुरुष प्रधान ,मर्दानगी बाली सोच का जन्म हुआ हे तब से ही लडकों को एक एसी एजुकेशन की जरुँरत हे जिसमे लडके को सही गलत अछे या बुरे न फर्क साफ़ पता हो दूरों के मोलिक अधिकारों के हनन से डर लगता हो उनको सेक्स एजुकेशन भी देनी चाहिए ,उनको भेद भाव बाली सोच से दूर रखना चाहिए 

बलात्कार की खबरों से अगर मन उभ गया हो तो अपनी आने बाली नश्लों के विषय में सोचो और अगर नहीं तो आपके पास कितने भी हत्यार क्यों न हों बारी आपकी भी आएगी 



 




धर्म और विज्ञान की सोच की अवधारणा

 धार्मिक व्यक्ति के अनुसार पहले ज्ञान था अब हम ज्ञान को भूल चुके हैं और अज्ञानी हो गए विज्ञान के अनुसार पहले हम कम जानते थे आज हम पहले से ज्...